अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-October
मंत्र लेखन का अभ्यास करें। नियमित उपासना घर में आस्तिकता का वातावरण बनाती है। अनुदान रूप में पारिवारिक सौहार्द्र, भावनात्मक विकास, बौद्धिक प्रगति व सघन-समृद्धि जो भी कुछ अभीष्ट है,सभी देती है। इसका महत्व युग संधि की बेला में तो अत्यधिक है। इसे भली भाँति समझकर हर धर्मनिष्ठ परिजन को इस दैनंदिन जीवन का एक अंग बनाना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-September
मंत्र लेखन संग्रह हो सकेगा। प्राण प्रतिष्ठा के समय 25 कुंडी यज्ञ होंगे। उनमें नैष्ठिक उपासक ही आहुति देंगे। इन्हें भी इन यज्ञ आयोजनों के द्वारा ही उत्पन्न तथा उत्साहित किया जा सकेगा। संपर्क बढ़ाने तथा उत्साह उभरने से शक्तिपीठों को अपने कार्यक्षेत्र में अधिक सहयोग, समर्थन भी मिलेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-June
मंत्र लेखन, जप तथा जन्मदिन मनाया जाएगा। हम हर गाँव में 4 घण्टे काम करने वाला एक आदमी रख करके जाएँगे, जो उपर्युक्त सारे कामों को पूरा करेगा तथा गाँव के अंतर्गत चेतना जाग्रत करेगा। वह 50 रुपये में भी काम कर सकता है। आज हम घर में दो-दो आदमी बेकार बैठे रहते हैं। उन्हें आप कहें तो वह 4 घण्टे समय दे देगा, आप इसे 50 रुपये दे दें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-April
मंत्र लेखन अथवा पाँच गायत्री चालीस पाठ। नैष्ठिक साधक इतना तो करें ही, अधिक बन पड़े तो और भी उत्तम है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-June
मंत्र लेखन-साधना में जितने अधिक व्यक्तियों को जोड़ा जा सके, जोड़ना चाहिए। स्वयं भी चौबीस मंत्र न्यूनतम रोज लिखने का संकल्प लेना चाहिए। मंत्र लेखन से बड़ा तप कोई नहीं। इसका महत्त्व जप से भी अधिक बताया गया है। थोड़े से मंत्रों का लेखन दस गुना पुण्य देता है।
मंत्र लेखन से बड़ा तप कोई नहीं। इसका महत्त्व जप से भी अधिक बताया गया है। थोड़े से मंत्रों का लेखन दस गुना पुण्य देता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-March
मंत्र लेखन की श्रद्धाँजलियाँ साथ लावें। अभी यह प्रयत्न करें कि कम से कम 1000 मंत्रों की कापियाँ अधिक से अधिक लिखाई जाय। उदार सज्जन अपने आप से भी कापियाँ बाँट सकते हैं। प्रयत्न यह किया जाय कि 1-1 हजार मंत्रों की 24 कापियाँ मथुरा आने वाले होता, यजमान इस क्षेत्र से संग्रह कराके लावें। एक व्यक्ति बहुत संख्या में लिखे इसकी अपेक्षा अनेक व्यक्तियों से लिखने का अधिक महत्व माना जायगा।
मंत्र लेखन, कीर्तन, चालीसा पाठ, प्रवचन, सत्संग आदि के आयोजन रखे जाएं। साहित्य वितरण का ब्रह्मभोजन हर उत्सव के साथ अवश्य किया जाय। जो व्यक्तिगत अनुष्ठान की अपनी साधना की सूचना हमें दे देंगे उनकी साधना में रही त्रुटियों का दोष परिमार्जन यहाँ होता रहेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-September
मंत्र लेखन हुआ है उसके हिसाब से इसका हवन 24 हजार कुण्डों में होने से पूरा हो सकता है। फिर जितने होता और यजमानों ने इस अनुष्ठान में भाग लिया है उनमें से दूर प्रदेशों के निवासियों के लिए आर्थिक एवं अन्य कारणों से मथुरा आ सकना भी कठिन है। इसलिए यह निश्चय किया गया है कि सन् 59 में पूरे एक वर्ष तक सभी शाखाओं में छोटे-बड़े यज्ञ हों और शेष 23 हजार कुण्डों के हवन की कमी, विभिन्न शाखाओं में यज्ञ आयोजन करके पूरी की जाय।
मंत्र लेखन की सामूहिक तपस्या एवं साधना इतनी बड़ी है, जिसके विस्तार की कल्पना करने से मनुष्य का मन कौतूहल से भर जाता है। लगभग एक लाख व्यक्ति इस साधन में संलग्न हैं। इतने बड़े जन-समूह द्वारा प्रतिदिन कई-कई घंटे साधना करना और 52 उपवास पूर्ण करना साधारण बात नहीं है। यह असाधारण आयोजन किसी व्यक्ति विशेष का कार्य नहीं वरन् उस महाशक्ति का ही क्रीड़ा कौतुक है जो युग निर्माण के लिए आवश्यक साधन तैयार करने में संलग्न है। उसी की प्रेरणा से इतना बड़ा आयोजन संभव हो सका।
मंत्र लेखन हो, वह अभूतपूर्व ही है। 2400000 व्यक्तियों तक गायत्री माता का संदेश पहुँचाने का ब्रह्मभोज उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। इस साधना के फलस्वरूप विश्व शान्ति के लिए उपयुक्त वातावरण का निर्माण होना निश्चित है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-April
मंत्र लेखन का पुण्य दश गुना अधिक माना गया है। इस प्रकार 24 हजार जप के अनुष्ठान की भाँति ही 24 सौ मंत्र लेखन का एक अनुष्ठान माना जाता है।
मंत्र लेखन किया जा सकता है। जप की अपेक्षा मंत्र लेखन का पुण्य दश गुना अधिक माना गया है। इस प्रकार 24 हजार जप के अनुष्ठान की भाँति ही 24 सौ मंत्र लेखन का एक अनुष्ठान माना जाता है।
मंत्र लेखन का एक अनुष्ठान माना जाता है।
मंत्र लेखन में समय का या स्नान आदि का भी प्रतिबन्ध नहीं है। अपने अन्य काम काज करते हुए 10 मिनट फुरसत कभी भी निकाली जा सकती है। इस प्रकार जिनके जी में महायज्ञ में सम्मिलित होने की इच्छा तो है पर साधना की कठिनाई से डरते हैं उनके लिए यह सबसे सरल साधना है।
मंत्र लेखन की एक सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जिस स्थान पर यह कापियाँ स्थापित की जाती हैं, जहाँ इनका नित्य पूजन होता है वह स्थान एक विशेष आध्यात्म-शक्ति से सम्पन्न बन जाता है। गायत्री तपोभूमि में 125 करोड़ हस्तलिखित गायत्री मन्त्र रखे हुए हैं, यह हजारों वर्षों तक सुसज्जित रूप से सुरक्षित रखे रहेंगे। इनका नित्य पूजन होता रहेगा। इन मंत्रों को प्रति वर्ष लाखों तीर्थ यात्री देखते और प्रकाश एवं प्रेरणा प्राप्त करते रहेंगे। इन मन्त्र लेखन कापियों के पन्नों में साधकों की आँतरिक श्रद्धा एवं तपस्या लिपटी रहती है।
मंत्र लेखनम्।
मंत्र लेखन एक अत्यन्त महत्वपूर्ण साधना विधि है। इसमें स्त्री, पुरुष, बाल, वृद्ध सभी प्रसन्नतापूर्वक भाग ले सकते हैं। इसमें कोई विशेष प्रतिबन्ध नहीं है। जब भी समय मिले, मंत्र लेखन किया जा सकता है। जप की अपेक्षा मंत्र लेखन का पुण्य दश गुना अधिक माना गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-December
मंत्र लेखन, चालीसा पाठ, अनुष्ठान, ब्रह्मचर्य, भूमि शयन आदि द्वारा अपनी देह को पवित्र किया है, इस कार्य को सफल बनायेंगी। इस प्रकार जो संदेश मुझे प्राप्त होते थे उनको मैं अपने साथियों को सुना देता और सुनने के बाद उनको प्रायः आश्चर्य ही हुआ करता था।
मंत्र लेखन करें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-October
मंत्र लेखन के लिये सवा करोड़ मंत्र लिखे जाने संकल्प भी वर्ष भर में पूरा करवाया जिसकी पूर्णाहुति गायत्री तपोभूमि की मन्दिर स्थापना व मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा के रूप में सम्पन्न हुई कहने का आशय यह कि इस मिशन का जो बीज है आधारभूत पृष्ठभूमि है उसे समष्टि के हित के लिये समूह द्वारा की गयी साधना कहा जाय तो अत्युक्तिपूर्ण न होगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-August
मंत्र लेखन यज्ञ
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-June
मंत्र लेखन यज्ञ देश भर में जारी रखा जायगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-April
मंत्र लेखन यज्ञ में सम्मिलित करें। चाहे कम से कम 240 मंत्र ही लिखें जाय पर लिखने वालों की संख्या बढ़ाने का अधिक प्रयत्न करना चाहिए। अभी यज्ञ में सवा करोड़ मंत्रों की स्थापना की ही सम्भावना है, पर यदि आप सब लोग इस दिशा में थोड़ा अधिक उत्साह दिखावें तो 24 करोड़ मंत्रों की स्थापना करके गायत्री तपोभूमि को और भी अधिक शक्ति सम्पन्न बनाया जा सकता है। आप इसके लिए प्रयत्न कीजिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-January
मंत्र लेखन तपश्चर्या का इस तीर्थ में एकीकरण होने से यह तीर्थ अधिक शक्ति सम्पन्न हो साथ ही इस बहाने साधकों को एक विशिष्ट प्रकार की लेखन साधना करने का अवसर मिले। लेखन में जप की अपेक्षा मेहनत एवं एकाग्रता अधिक होती है इसलिए उसका फल भी अधिक माना गया है। हर्ष की बात है कि 24 लाख हस्तलिखित मंत्र पिछली गायत्री जयन्ती तक ही हमारे पास जमा हो गये थे। इस समय उनकी संख्या करीब 85 लाख है। साधकों के उत्साह को देखते हुए यह निश्चय जान पड़ता है कि 125 लाख (सवा करोड़) मंत्र आगामी गायत्री जयन्ती के पूर्णाहुति यज्ञ तक आसानी से पूरे हो जावेंगे।
मंत्र लेखन यज्ञ में जिस उत्साह से साधकों ने भाग लिया है उसे देखकर बड़ा सन्तोष एवं हर्ष होता है। आरम्भ में 24 लक्ष मंत्र लिखाकर गायत्री मन्दिर में प्रतिष्ठित करने का संकल्प था। ताकि इतने सत् साधकों की मंत्र लेखन तपश्चर्या का इस तीर्थ में एकीकरण होने से यह तीर्थ अधिक शक्ति सम्पन्न हो साथ ही इस बहाने साधकों को एक विशिष्ट प्रकार की लेखन साधना करने का अवसर मिले। लेखन में जप की अपेक्षा मेहनत एवं एकाग्रता अधिक होती है इसलिए उसका फल भी अधिक माना गया है। हर्ष की बात है कि 24 लाख हस्तलिखित मंत्र पिछली गायत्री जयन्ती तक ही हमारे पास जमा हो गये थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-March
मंत्र लेखन यज्ञ तथा 24 महापुरश्चरण की पूर्णाहुति के साथ-साथ गायत्री मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा यह आयोजन इस युग का एक महान पुण्य पर्व है। इसे तामसिक अपव्ययों, राजसिक प्रदर्शनों से बचाकर ब्रह्म वर्चस्व और ऋषिकल्प सात्विकता प्रधान ही रखा जा रहा है। इस यज्ञ में केवल कुछ तपे हुए और परखे हुए लोगों को ही सम्मिलित किया जा रहा है ताकि यज्ञ की सूक्ष्म शक्ति में अभिवृद्धि हो। ता. 20, 21, 22, जून सन् 53 को यह यज्ञ आयोजन होगा। जिन्हें स्वीकृति मिल चुकी है उन्हें ता. 19 की शाम को ही मथुरा पहुँच जाना चाहिए।
मंत्र लेखन यज्ञ में भागीदार बनने वाले सज्जनों की संख्या बढ़ाने का प्रयत्न करना गायत्री प्रेमियों का आवश्यक कर्त्तव्य हैं।
मंत्र लेखन यज्ञ उत्साह पूर्वक चालू है। कई व्यक्तियों ने आश्चर्यजनक संख्या में मंत्र लिखे हैं। आशा की जाती है कि कुछ ही दिनों में वह संख्या 24 करोड़ तक पहुँच जायगी। अच्छा यह हो कि अधिकाधिक लोगों को इस यज्ञ में सम्मिलित किया जाय। मंत्रों की संख्या बढ़ने की अपेक्षा लिखने वाले व्यक्तियों की संख्या में वृद्धि होना अधिक महत्वपूर्ण है।
मंत्र लेखन का अधिकाधिक प्रचार करें, भले ही कोई थोड़ी-थोड़ी संख्या में ही लिख सकें पर धार्मिक प्रकृति के अपने निकटवर्ती लोगों को अधिक संख्या में इस यज्ञ में सम्मिलित करने का प्रयत्न अवश्य करना चाहिए। कम से कम 240 तक की संख्या में भी मंत्र लिखाये जा सकते हैं। मंत्र लेखन यज्ञ में भागीदार बनने वाले सज्जनों की संख्या बढ़ाने का प्रयत्न करना गायत्री प्रेमियों का आवश्यक कर्त्तव्य हैं।
मंत्र लेखन यज्ञ
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-November
मंत्र लेखन कराने के बाद एक विशाल पूर्णाहुति कराने का उनका विचार है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-May
मंत्र लेखन यज्ञ मन्द गति से चल रहा है। इस दिशा में साधकों का उत्साह कुछ शिथिल होता जाता है, जो ठीक नहीं है अब तक करीब 80 करोड़ मंत्र आ चुके हैं। यह संख्या 125 करोड़ पूरी करनी है। सो इस दिशा में प्रयत्न जारी रहना चाहिए। जो लोग अपने हिस्से का मंत्र लेखन पूरा कर चुके हो वे भी यह लेखन साधना जारी रखें एवं नये मंत्र लेखक उत्पन्न करें।
मंत्र लेखन पूरा कर चुके हो वे भी यह लेखन साधना जारी रखें एवं नये मंत्र लेखक उत्पन्न करें। साधारणतः 2400 मंत्रों की प्रत्येक साधक से आशा की गई। इससे अधिक लिखना यह लेखन साधना बारंबार जारी रखना और भी अधिक प्रशंसनीय है।
मंत्र लेखन यज्ञ
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-November
मंत्र लेखन करने वाले साधक गण इस अश्वमेध में भाग लेंगे। उसके लिए आवश्यक उत्तरदायित्वों का वितरण कर दिया गया है। गायत्री उपासना की व्यापक जानकारी और महत्व पर प्रकाश डालने वाली पुस्तकों के व्यापक प्रसार की व्यवस्था की जा रही है। हिंदी में प्रकाशित उपासना के दो चरण जप और ध्यान का अंग्रेजी अनुवाद “रिसाइटेशन एंड मेडीटेशन-दि टू स्टेजेज ऑफ वरशिप” तथा दि ग्रेट साइंस ऑफ गायत्री नामक पुस्तकें इस संबंध में सहायक और मार्गदर्शक सिद्ध हुई हैं उनकी भाग माँग को पूरा किया जा रहा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-January
मंत्र लेखन, गायत्री सहस्र नाम पाठ आदि उपासनाऐं भी उत्तम हैं। भजन, कीर्तन एवं रामायण गीता आदि के पाठ भी जिनसे बन पड़े करें। इसी प्रकार और भी उपासनात्मक कार्यक्रम बनाये जा सकते हैं। जिससे जितना बन पड़े कुछ न कुछ करना अवश्य चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-April
मंत्र लेखन या 240 गायत्री चालीसा पाठ का नियम बिना किसी नियम प्रतिबन्ध के पूरा कर सकते हैं। अनुष्ठान काल में (1) ब्रह्मचर्य (2) अस्वाद व्रत या उपवास (3) हजामत, कपड़े धोना आदि अपनी शरीर सेवाऐं स्वयं ही करना (4) भूमि या तख्त पर सोना (5) चमड़े की वस्तुओं का त्याग यह तपश्चर्याऐं अनुष्ठान काल में उपयोगी हैं। इनमें से ब्रह्मचर्य तो अनिवार्य है शेष 4 ऐच्छिक हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-May
मंत्र लेखन आदि अनेक प्रवृत्तियों के द्वारा अपना श्रम, समय और श्रद्धा इकट्ठी कर करके इस तपोभूमि को उसी प्रकार तेजस्वी बना रहे हैं जिस प्रकार त्रेता में असुरता से देवत्व की रक्षा करने के लिए ऋषियों ने थोड़ा थोड़ा रक्त इकट्ठा करके एक घड़ा भरा था और उस घड़े से जगत तारिणी सीता माता उत्पन्न हुई थीं। तपोभूमि को भी एक प्रकार से त्रेता जैसा रक्त घट ही बनाया जा रहा है। उसके निर्माण, पोषण, संचालन, सुव्यवस्था, आदि के लिए अनेकों उच्चकोटि की आत्माएं जिस गम्भीर श्रद्धा भावना एवं अनन्य तत्परता के साथ संलग्न हैं उसे देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि आज ब्रह्म दृष्टि से छोटा सा दीखने वाला यह आश्रम, कल सचमुच ही एक वास्तविक एवं चैतन्य तीर्थ बनकर रहेगा। अब तक अगणित घटनाएं इसके साथ ऐसी ही आत्मत्याग से भरी हुई जुड़ चुकी हैं। उस शृंखला में एक सुनहरी कड़ी अभी इस चैत्र की नवरात्रि के समय और भी जुड़ी है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-January
मंत्र लेखन साधना का अपने क्षेत्र में व्यापक प्रचार कीजिए। धार्मिक प्रकृति के पढ़े लिखे लोगों को गायत्री मंत्र लिख लिख कर तपोभूमि भेजते रहने की साधना में लगाइए। कभी चर्खा कतई यज्ञ की तरह गायत्री मंत्र की लिखाई के सामूहिक आयोजन भी किये जा सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-April
मंत्र लेखन आदि अनुष्ठानों में कितने ही नर नारी लगे हुए हैं, कइयों ने बड़ी कठोर तपश्चर्याओं के साथ साधना का व्रत लिया है। यह सभी निष्ठावान उपासक भूरि-भूरि प्रशंसा के योग्य हैं। आत्म बल की वृद्धि, आँतरिक पवित्रता की स्थापना, प्रभु शरणागति, बड़े ही महत्वपूर्ण तत्व हैं। इन्हें उपासना के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। पर ये आवश्यक हैं।
मंत्र लेखन महायज्ञ के लिए वे बड़ी तत्परतापूर्वक कार्य कर रहे हैं। उपासकों का सच्चा सहयोग मिल रहा है। -एक उपासक
मंत्र लेखन कार्यक्रम में प्रगति हो रही है। -जगमोहन लाल निगम
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-January
मंत्र लेखन, 24 हजार आहुतियाँ मुख्य हैं, पूरा करने के लिए सामुदायिक आयोजनों की व्यवस्था पर अधिक जोर देना चाहिए। गायत्री परिवार की शाखाएं बनाकर वह कार्य संगठित रूप से सरलतापूर्वक हो सकता है। गायत्री उपासकों की मनोदिशा इस वर्ष यही संगठित साधन करने में लगानी चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-February
मंत्र लेखन तथा 24 आहुतियों का हवन किया करेंगे। -विद्या प्रसाद मिश्र
मंत्र लेखन आरम्भ कर दिया गया है। -रामावतार शर्मा
मंत्र लेखन कराने का संकल्प लेकर इस क्षेत्र में बड़े उत्साहपूर्वक कार्य संलग्न हैं। अब तक कई लाख मंत्र लिखे जा चुके हैं। कुछ दिन पूर्व सरढव में एक कुण्डी यज्ञ हुआ, जो सात दिन तक चलता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-March
मंत्र लेखन चालू है।
मंत्र लेखन के लिये कापी, दवात, कलम आदि उपलब्ध रहें धार्मिक चित्रों एवं शिक्षाप्रद वाक्यों से नवरात्रि का उपासना स्थान सजाया जाय, जौ बो दिये जायं, कलश एवं माता की प्रतिमा स्थापित रहे। कीर्तन प्रवचन, हवन आदि की व्यवस्था रहे इस प्रकार एक सुन्दर एवं प्रभावशाली कार्यक्रम बन सकता है। गायत्री चालीसा का कीर्तन बाजे पर मधुर स्वर से करने में बड़ा सुँदर मालूम पड़ता है। एक सी वेषभूषा में पीले वस्त्र पहन कर पीले दुपट्टे डाले हुए साधक एक लाइन में बैठे हुए बहुत ही शोभायमान लगते हैं। ऐसे दृश्य देखकर नये व्यक्तियों के मन में भी साधना की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है।
मंत्र लेखन उपासना करने लगे। एक योग्य तेजस्वी छात्र ने यह देख गायत्री उपासना का बड़ा मजाक उड़ाया। आश्चर्य मुझे भी हुआ कि परीक्षा में ये दोनों छात्र उत्तीर्ण और तेजस्वी छात्र ही फेल हो गया।
मंत्र लेखन का प्रचार करने के लिए प्रयत्न किया गया।
मंत्र लेखन 1200 पाठ गायत्री चालीसा के, हवन, प्रवचन का बड़ा श्रद्धापूर्ण आयोजन हुआ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-August
मंत्र लेखन के लिए घर-घर घूमना और प्रतिदिन सहस्रों गायत्री मंत्र लेखन कराना आज कल उनका प्रमुख कार्य है। अपने जीवन काल में सहस्रों गायत्री उपासक उत्पन्न करने की उनकी साध का पूरा होना, वर्तमान उत्साह को देखते हुए निश्चित सा ही है।
मंत्र लेखन और सामूहिक यज्ञ किया। प्रत्येक सदस्य द्वारा गुरु चरणों में दक्षिणा भी अर्पित की गयी जो एकत्रित करके भेजी जायेगी।
मंत्र लेखन का बड़ा प्रचार किया और लाखों की संख्या में मंत्र लिखकर तपोभूमि भेजे। अब वे स्वयं अपनी नैष्ठिक गायत्री उपासना के साथ-साथ दूसरों को भी इस पुण्य पथ का मार्गदर्शन करते रहते हैं, उनकी प्रेरणा से अनेकों को बड़े सत्परिणाम प्राप्त करने का सुअवसर मिला है। गायत्री तपोभूमि को अधिक सुविकसित करने की आपकी बड़ी भावना है।
मंत्र लेखन कराना आज कल उनका प्रमुख कार्य है। अपने जीवन काल में सहस्रों गायत्री उपासक उत्पन्न करने की उनकी साध का पूरा होना, वर्तमान उत्साह को देखते हुए निश्चित सा ही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-June
मंत्र लेखन का कार्यक्रम पूर्ण किया गया। नवमी के दिन 5 यज्ञ कुण्डों में 24 हजार मंत्रों की पूर्णाहुति की गई और 340 कुमारी कन्याओं को भोजन कराया गया। इसमें राम शरन लाल गुप्त रामेश्वर प्रसाद गुप्त, चन्दन बाई, जनक नन्दनी बाई आदि अनेक सदस्यों का कार्य सराहनीय रहा।
मंत्र लेखन हुआ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-July
मंत्र लेखन हुआ।
मंत्र लेखन का अनुष्ठान किया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-October
मंत्र लेखन की योजना भी चालू है।
मंत्र लेखन तथा पाठ होता था। यह चरण पूरा हो गया, दूसरे चरण में इस संख्या को पाँच गुनी करना था, जप को 24 लाख प्रतिदिन से बढ़ाकर सवा करोड़ और 24 हजार पाठ, लेखन हवन को बढ़ा कर सवा लाख प्रतिदिन करना था। यही प्रयत्न इन दिनों चल रहा है। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत एवं व्यापक प्रचार की आवश्यकता है अन्तिम तीसरा चरण वह होगा जिसके अंतर्गत प्रतिदिन 24 करोड़ जप और 24 लाख हवन, पाठ, लेखन का क्रम चलेगा। प्रथम चरण की अपेक्षा सौ गुना और तृतीय चरण की अपेक्षा 20 गुना आयोजन निस्संदेह अब की अपेक्षा कहीं अधिक तत्परता एवं प्रयत्नशीलता की अपेक्षा रखेगा।
मंत्र लेखन की योजना बनाई गयी है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-May
मंत्र लेखन हुआ। भविष्य के लिये यहाँ 9 कुण्डों में सवालाख आहुतियों के यज्ञ की तैयारी हो रही है। अखत्यापुर में नवरात्रि में पाँच सदस्यों ने एक लाख बीस हजार जप किया और हर रोज हवन हुआ तथा अन्तिम दिन 2400 आहुतियों का हवन किया गया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-November
मंत्र लेखन का अनुष्ठान पूरा किया, जो पहले से चल रहा था।
मंत्र लेखन किया गया। यहाँ अभी कार्य आरम्भ किया गया है, आगे चलकर प्रचार बढ़ेगा।
मंत्र लेखन भी हुआ। नौ दिन तक बराबर दुर्गा सप्तशती, रामायण गीता का पाठ होता रहा। इस कार्य में बिहारीलाल जी पाठक व किशनलालजी पाठक ने अकथनीय परिश्रम किया। एक गायत्री पुस्तकालय की स्थापना हुई। उसके लिए मैंने अपना एक स्वतंत्र कमरा सदैव को प्रदान कर दिया) ।
मंत्र लेखन, 2389 चालीसा-पाठ का अनुष्ठान किया गया। रात्रि के समय जनता द्वारा रामायण का पारायण किया जाता था। दशमी को ओंकारलालजी शास्त्री द्वारा 5 कुण्डों में लाउडस्पीकर से पूर्णाहुति की गई। एक कुँड महिलाओं के लिये अलग था। प्रसाद वितरण व कन्या-भोज कराया गया।
मंत्र लेखन, 1000 गायत्री चालीसा पाठ, 500 गायत्री पुस्तक वितरण किया गया। पूर्णाहुति बड़े समारोह तथा विधिपूर्वक सम्पन्न हुई।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-February
मंत्र लेखन या भगवान्नाम रूपी एक सुनियोजित कार्यक्रम पाठकगण आगामी माह की अखण्ड ज्योति एवं प्रज्ञा अभियान पाक्षिक युग निर्माण योजना मासिक में पढ़ सकेंगे। इस प्रक्रिया से देश का कोई भी कोना अछूता नहीं रहेगा और सूक्ष्म स्तर पर यह विराट धर्मानुष्ठान व सम्पन्न हो सकेगा जो भावी आयोजनों के आधारशिला रखेगा, नवयुग की पृष्ठभूमि बनायेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-March
मंत्र लेखन का लक्ष्य पूरा करने का संकल्प लिया गया है। कल्पना की जाती है कि अधिकाधिक साधक इस नैष्ठिक अभियान में जुड़ेंगे एवं अपनी श्रद्धाँजलि अन्ततः 2001 में युग देवता के चरणों में द्वितीय पूर्णाहुति में अर्पित करेंगे। प्रस्तुत नवरात्रि पर्व बड़ी ही विषम वेला में संधिकाल की अवधि में इस वर्ष चैत्र नवरात्रि के रूप में 20 मार्च से 28 मार्च की समयावधि में आया है। गायत्री परिवार की जहाँ भी शाखाएं प्रज्ञामण्डल, स्वाध्याय मण्डल, प्रज्ञा संस्थान छोटे व बड़े रूप में मनायें। सामूहिकता में बड़ी शक्ति होती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-July
मंत्र लेखन वहाँ स्थापित हुआ, अखण्ड अग्नि हिमालय के अति पवित्र स्थान से लाकर स्थापित की गयी जो अभी तक वहाँ यज्ञशाला में जल रही है। 1941 से 1971 तक समय परमपूज्य गुरुदेव का गायत्री तपोभूमि - अखण्ड ज्योति संस्थान में सक्रिय रहने का समय है। 1956 में नरमेध यज्ञ, 1958 में सहस्रकुंडी यज्ञ करके लाखों गायत्री साधकों को एकत्र कर उनने गायत्री परिवार का बीजारोपण कर दिया। कार्तिक पूर्णिमा 1958 में आयोजित इस कार्यक्रम में दस लाख व्यक्तियों ने भाग लिया, इन्हीं के माध्यम से देश भर में प्रगतिशील गायत्री परिवार की दस हजार से अधिक शाखाएँ स्थापित हो गयी। संगठन का अधिकाधिक कार्यभार पूज्यवर परम वंदनीया माताजी पर सौंपते चले गए एवं 1949 में पत्रिका का संपादन उन्हें देकर पौने दो वर्ष के लिए हिमालय चले गए, जहाँ उन्हें गुरुसत्ता से मार्गदर्शन लेना था, तपोवन, नंदनवन में ऋषियों से साक्षात्कार करना था तथा गंगोत्री में रहकर आर्ष ग्रन्थों का भाष्य करना था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-October
मंत्र लेखन में सन्देह करते हैं। चूँकि वे शास्त्र को मानने वाले हैं। पुष्टि मार्गी आचार्य का वाक्य ही उनका शास्त्र है। ऐसी दशा में उन्हें हर एक उस पुस्तक का पूर्ण निषेध करना चाहिए। जिससे वेद मन्त्र छपे या लिखे हों।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-July
मंत्र लेखन के नियम बड़े सरल हैं कोई भी द्विज स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध उसमें प्रसन्नता पूर्वक भाग ले सकती हैं। स्कूली कापी साइज की कापियों पर सुबोध अक्षरों में शुद्धतापूर्वक मंत्र लिखने चाहिए। स्याही या कलम का कोई प्रतिबंध नहीं है। साधारणतः एक व्यक्ति से 2400 मंत्र लिखने की अपेक्षा की जाती है। जो अधिक लिख सकते हों वे प्रसन्नता पूर्वक अधिक लिखें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-August
मंत्र लेखन संग्रह करके नये युग-निर्माण-मन्दिर स्थापित किये जा सकते हैं। जहाँ अपनी विचारधारा के दस-पाँच व्यक्ति भी हों, वहाँ वे मिल-जुलकर ‘युग-निर्माण मित्र-मण्डल’ चला सकते हैं और उसके द्वारा उस क्षेत्र में प्रेरणा और प्रकाश प्रदान करने का बहुत काम हो सकता है। नव रात्रि में 8 दिन के शिक्षण शिविर चलाये जा सकते हैं। उनमें व्यवहारिक जीवन को आध्यात्मवादी बनाने का प्रशिक्षण दिया जाया करे तो बौद्धिक एवं सामाजिक क्रान्ति के लिये पृष्ठभूमि तैयार हो सकती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-June
मंत्र लेखन महापुरश्चरण मूर्तिमान बनाकर किराये के या माँगे हुए कमरे में सुसज्जित रूप से प्रतिष्ठापित कर दिया जाय, और उसी स्थान को युग-निर्माण योजना को प्रसारित करने का केन्द्र बनाया जाय। इमारतें बनाना जरूरी नहीं। शक्तियाँ कार्य विस्तार में लगनी चाहिए। मूर्तियों के भोग प्रसाद का अनिवार्य उत्तरदायित्व उठाने की अपेक्षा बड़े साइज के सुसज्जित चित्रों की ही स्थापना और उनकी पूजा आरती का सामान्य क्रम चलाने में कोई बंधन और खर्च नहीं बँधता। ऐसे छोटे मन्दिर हर जगह आसानी से बन सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-September
मंत्र लेखन किया है वे इस केन्द्र के संचालक सदस्य माने जावेंगे, और उन्हें यहाँ के कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए विशेष आग्रह एवं सम्मानपूर्वक बुलाया जाता रहेगा। यों यहाँ से चलने वाली प्रवृत्तियों में कोई भी धार्मिक व्यक्ति प्रसन्नतापूर्वक भाग ले सकता है।
मंत्र लेखन करने वाले व्यक्ति ही आहुतियाँ देंगे। उसी दिन सुसज्जित अलमारियों में मंत्र लेखन की जिल्ददार कापियाँ स्थापित की जायेंगी और गायत्री माता की बड़े साहज कर आइल पेन्ट जो चित्र बनेगा उसकी प्रतिष्ठा होगी। मूर्तियों की स्थापना और प्राण-प्रतिष्ठा में पुजारी रखने और विधिवत् पूजा होने का बन्धन है पर चित्र के लिए यह अनिवार्य नहीं। इसलिए माता का चित्र एवं मन्त्र लेखन की सम्मिलित स्थापना से जो मन्दिर बनेगा वही सब के लिए सुविधाजनक रहेगा।
मंत्र लेखन लोगों से कराने का कार्यक्रम आरंभ कर दिया गया है। इस आध्यात्मिक श्रमदान में कम से कम 108 व्यक्ति भाग लेंगे।
मंत्र लेखन की जिल्ददार कापियाँ स्थापित की जायेंगी और गायत्री माता की बड़े साहज कर आइल पेन्ट जो चित्र बनेगा उसकी प्रतिष्ठा होगी। मूर्तियों की स्थापना और प्राण-प्रतिष्ठा में पुजारी रखने और विधिवत् पूजा होने का बन्धन है पर चित्र के लिए यह अनिवार्य नहीं। इसलिए माता का चित्र एवं मन्त्र लेखन की सम्मिलित स्थापना से जो मन्दिर बनेगा वही सब के लिए सुविधाजनक रहेगा।
मंत्र लेखन चालू हो गया है। जब यह कार्य पूरा हो जायेगा तब अन्त में सामूहिक गायत्री यज्ञ रखा जायगा, जिसमें मंत्र लेखन करने वाले व्यक्ति ही आहुतियाँ देंगे। उसी दिन सुसज्जित अलमारियों में मंत्र लेखन की जिल्ददार कापियाँ स्थापित की जायेंगी और गायत्री माता की बड़े साहज कर आइल पेन्ट जो चित्र बनेगा उसकी प्रतिष्ठा होगी। मूर्तियों की स्थापना और प्राण-प्रतिष्ठा में पुजारी रखने और विधिवत् पूजा होने का बन्धन है पर चित्र के लिए यह अनिवार्य नहीं। इसलिए माता का चित्र एवं मन्त्र लेखन की सम्मिलित स्थापना से जो मन्दिर बनेगा वही सब के लिए सुविधाजनक रहेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-November
मंत्र लेखन का दूसरा गायत्री चालीसा पाठ का। गायत्री तपोभूमि में 124 करोड़ हस्तलिखित गायत्री मन्त्र स्थापित करने का संकल्प था। इसमें से करीब 90 करोड़ संग्रह हुआ है। लगभग 5 करोड़ अभी शेष हैं। यह इस वर्ष गायत्री जयन्ती तक पूरा हो जाना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-December
मंत्र लेखन एवं गायत्री चालीसा का पाठ भी हो सके तो करना चाहिये। जिन्हें माला जपने में सुविधा नहीं, वे एक पाठ गायत्री चालीसा का या 24 मंत्र लेखन करके भी गायत्री परिवार के सदस्य बन सकते हैं। जप, चालीसा, पाठ, मन्त्रलेखन इन तीनों के से एक साधना में भी जो थोड़ा समय लगा सकते हैं वे अ. भा. गायत्री परिवार के छपे हुए संकल्प पत्र भर कर सदस्य बन सकते हैं। सबसे पहला काम जो हम लोगों को करने का है वह यह है, कि अपने घर-परिवार में, स्वजन संबंधियों में, परिचितों में धार्मिक प्रकृति के नर-नारियों का नाम नोट कर और उनके पास जा जाकर सारी स्थिति समझाने और सदस्य बनने के लिये प्रयत्न करें। यह प्रयत्न रोज ही चलता रहे और एक सदस्य बनाने की भी रोज सफलता प्राप्त की जाती रहे तो एक महीने में तीस नहीं तो दस-बीस सदस्य, कोई भी उत्साही कार्यकर्ता बना सकता है।
मंत्र लेखन का आयोजन।
मंत्र लेखन करके भी गायत्री परिवार के सदस्य बन सकते हैं। जप, चालीसा, पाठ, मन्त्रलेखन इन तीनों के से एक साधना में भी जो थोड़ा समय लगा सकते हैं वे अ. भा. गायत्री परिवार के छपे हुए संकल्प पत्र भर कर सदस्य बन सकते हैं। सबसे पहला काम जो हम लोगों को करने का है वह यह है, कि अपने घर-परिवार में, स्वजन संबंधियों में, परिचितों में धार्मिक प्रकृति के नर-नारियों का नाम नोट कर और उनके पास जा जाकर सारी स्थिति समझाने और सदस्य बनने के लिये प्रयत्न करें। यह प्रयत्न रोज ही चलता रहे और एक सदस्य बनाने की भी रोज सफलता प्राप्त की जाती रहे तो एक महीने में तीस नहीं तो दस-बीस सदस्य, कोई भी उत्साही कार्यकर्ता बना सकता है। इस प्रकार हम सब जुट पड़ें, तो सवा लाख गायत्री उपासक-गायत्री परिवार के सदस्य बनाने का कार्य कुछ ही महीनों में पूरा हो सकता है।
मंत्र लेखन, 4—सवालक्ष गायत्री उपासक बनाना, 5—एक हजार गायत्री परिवारों की स्थापना, 6—सवालक्ष व्यक्तियों को धर्म शिक्षा देना। यह छह कार्य अर्थात् दो तिहाई संकल्प तो अनायास ही पूर्ण हो जाता है। केवल दो सूत्र-तपोभूमि में लक्ष चण्डी महानुष्ठान तथा 24 हजार हवन की प्रतिदिन की बात ही शेष रह जाती है। अप्रत्यक्ष रूप से वह भी इन्हीं छह सूत्रों में जुड़ी हुई है। सदस्य बढ़ने पर उसका पूरा होना भी अति सरल है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-March
मंत्र लेखन की साधना।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-December
मंत्र लेखन, उपवास, गायत्री चालीसा पाठ से ऊर्जा भरा वातावरण बनाया गया एवं संवत् 2010 की पावन गायत्री जयंती (22 जून, 1953) से जुड़ी 19 से 24 जून की तारीखों में कुल 240 साधकों का एक अनुपम समागम हुआ एवं एक अलौकिक दैवी वातावरण में गायत्री महाशक्ति के विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा कर दी गई।
मंत्र लेखन अभियान को, जीवन साधना को प्रखर बनाने की प्रक्रिया को गति दी गई। साथ ही साथ शाँतिकुँज हरिद्वार स्थित मुख्य केंद्र से सात जोनों के निर्माण का संगठनात्मक पुरुषार्थ भी चलता रहा, सभी वरिष्ठ कार्यकर्ता भाइयों ने सघन मंथन प्रधान दौरे किए एवं संगठन का एक सशक्त सुव्यवस्थित स्वरूप अब क्रमशः उभर कर आ रहा है। शाँतिकुँज गायत्री तीर्थ एवं गायत्री तपोभूमि, मथुरा दोनों ने ही अब साधना की धुरी पर संगठन को गति देने हेतु मिलकर प्रचंड पुरुषार्थ करने की ठानी है, ताकि इस वर्ष हम अधिकाधिक प्राणवान संकल्पित समर्थ समयदानी तैयार कर सकें। इसके लिए चर्चाओं के कई दौर हुए एवं फिर इस समारोह में पधारे क्षेत्र के वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने भी गहन चिंतन, परामर्श होता रहा। निष्कर्ष जो निकलकर आए हैं, वे समुद्र मंथन के चौदह रत्नों की तरह हैं एवं इतने मूल्यवान हैं कि इस राष्ट्र एवं जगती की काया पलट करके रख देंगे, ऐसा लगता है।
मंत्र लेखन साधना, स्वाध्याय, अंशदान की नियमितता एवं गौसेवा के लिए किए जाने वाले प्रयासों की चर्चा की। संकल्पों की भावभरी पृष्ठभूमि इन चार गोष्ठियों ने बना दी थी, इसीलिए शाम का दीपमहायज्ञ अलौकिक वातावरण में शपथ के साथ सम्पन्न हुआ।
मंत्र लेखन की पुस्तिकाओं का भी पूजन आरती का क्रम चला। पूज्यवर एवं मातृसत्ता द्वारा 1971 में अपने पैरों से निकालकर रखी गई पादुकाएं भी सबके लिए स्पर्श दर्शन हेतु रख दी गई एवं मंदिर दर्शन हेतु खोल दिया गया। प्रातः सात से प्रखर प्रज्ञा सजल श्रद्धा, फिर ऋषि युग्म सहित आद्यशक्ति गायत्री की मूर्ति, चरण पादुकाओं का दर्शन पंक्तिबद्ध हो चलता रहा। यह क्रमशः रात्रि तक सतत चलता रहा, जब तक कि सभी ने दर्शन नहीं कर लिए। पंक्ति कभी नहीं टूटी।
मंत्र लेखन की सौ सौ प्रतियाँ लिए ढेरों व्यक्ति देखे जा सकते थे। कलश यात्रा से लेकर पूर्णाहुति तक अनुशासन देखते बनता था। पत्रकारों तथा अनेक संगठनों की उक्तियाँ इस सम्बन्ध में प्रमाण है।तपोभूमि से डेढ़ किलोमीटर पूर्व ( दक्षिण की ओर ) अखण्ड ज्योति संस्थान से लेकर जनजागरण प्रेस, बिड़ला मंदिर (उत्तर की ओर ) तथा पूरे वृंदावन में पीत वस्त्रधारी ही चारों ओर दिखाई दे रहे थे। मूर्ति स्थापना समारोह के बाद अनेकों परिजनों ने वैसी ही अनुभूति की, जैसी कि प्राण प्रतिष्ठा के समय 1952-53 में साधकों ने की थी।
मंत्र लेखन स्थापित किए गए थे। बाद में 1971 में गुरुसत्ता के मथुरा से हरिद्वार प्रयाण के बाद जल रज वाले कक्ष में परमपूज्य गुरुदेव की पादुकाओं एवं उनके एक चित्र की तथा मंत्रलेखन वाले कक्ष में परमवंदनीया माता जी की पादुकाओं तथा उनके चित्र की भी स्थापना कर दी गई।
मंत्र लेखन की साधना कराकर आए थे।
मंत्र लेखन की सौ सौ प्रतियाँ लिए ढेरों व्यक्ति देखे जा सकते थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-October
मंत्र लेखन अभियान को तीव्र गति दे सकें। कम−से−कम सौ मंत्रलेखन पुस्तिकाएँ प्रतिमाह, इस प्रकार गायत्री जयंती 2003 एक हजार पुस्तिकाएँ विभिन्न परिजनों से लिखवा सकें, उन्हें विराट तप में भागीदार बना सकें। सभी भाषाओं में ये पुस्तिकाएँ उपलब्ध हैं।
मंत्र लेखन अभियान को गति दें, पत्रिकाओं के पाठकों की संख्या में अभिवृद्धि करें तथा मिशन की सप्त क्राँति योजना को पूर्णता तक पहुँचाएँ। गायत्री तपोभूमि मथुरा एवं शाँतिकुँज हरिद्वार द्वारा घोषित सातों आँदोलनों की एक सम्मिलित कार्य योजना संगठनात्मक स्तर पर सक्रिय करने के लिए एक संपादकीय में इसी अंक में अगले पृष्ठों पर दी गई है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-November
मंत्र लेखन अभियान को गति दी गई है, तो साथ ही गायत्री साधना को सभी भाषा-भाषियों में पहुँचाने व साधना की गहराई बढ़ाने पर भी जोर दिया जाना है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-September
मंत्र लेखन भी प्रस्तावित गायत्री तीर्थ में उसी दिन स्थापित किये जाने की घोषणा की गयी।
मंत्र लेखन का क्रम चला। 2400 मंत्र लिख कर लोग कापियाँ गायत्री तपोभूमि में जमा करने लगे। इससे आँदोलन बच्चों बड़ों सभी के माध्यम से घर-घर तक पहुंच गया।
मंत्र लेखन ही पर्याप्त है। पंचाक्षरी ॐ भूर्भुवः स्वः का जप भी जो कर ले उसे भी वे यज्ञ की पात्रता दे देते थे। मात्र वनौषधियों से होने वाले इन यज्ञों में पहले दिन कलश यात्रा इसी तथ्य की घोषणा करती थी कि सभी स्त्री पुरुषों को यज्ञ में सम्मिलित होने का अधिकार है। ब्राह्मण व्यक्ति अपने कर्मों से बनता है, जन्म से नहीं होता।
मंत्र लेखन व नियमित अनुष्ठान करने को कहा। उनके स्वयं के चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरणों की समाप्ति का समय आ रहा था। गायत्री जयन्ती 1943 में उसकी औपचारिक पूर्णाहुति होनी थी। उस दिन तक उनने तपोभूमि पर मन्दिर के निर्माण तथा गायत्री माता की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा कर डालने का निश्चय कर लिया व इस पुनीत कार्य में सभी साधकों से सहयोग माँगा। उसके लिए नवम्बर माह 1949 के अंक में गायत्री तपोभूमि का संभावित रूप क्या होगा, इसका एक चित्र छापा व उसके नीचे एक पंक्ति दी, “देखें किन्हें पुण्य मिलता है इस पवित्र तीर्थ को बनाने का” आश्चर्य होता है यह देखकर कि तपोभूमि वैसी ही बनी जैसा कि इसका प्रारूप बनाया गया था।
मंत्र लेखन का अनुरोध भी। ऊपर वर्णित यज्ञ चैत्र माह 1953 (संवत् 2013) तक चलने थे। इनके समापन पर ही विशाल 108 महाकुण्डी यज्ञ व नरमेध यज्ञ का आयोजन किया गया। नरमेध प्रक्रिया देखने हजारों व्यक्ति आ जुटे। जिनने समाज के लिए कार्य करने का संकल्प लिया था उसके हाथ अलग-अलग रंग की रेशम की डोरियों से खंभों से बाँधे गये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-August
मंत्र लेखन भी प्रस्तावित गायत्री तीर्थ में उसी दिन स्थापित किये जाने की घोषणा की गयी।
मंत्र लेखन का क्रम चला। 2400 मंत्र लिख कर लोग कापियाँ गायत्री तपोभूमि में जमा करने लगे। इससे आँदोलन बच्चों बड़ों सभी के माध्यम से घर-घर तक पहुंच गया।
मंत्र लेखन ही पर्याप्त है। पंचाक्षरी ॐ भूर्भुवः स्वः का जप भी जो कर ले उसे भी वे यज्ञ की पात्रता दे देते थे। मात्र वनौषधियों से होने वाले इन यज्ञों में पहले दिन कलश यात्रा इसी तथ्य की घोषणा करती थी कि सभी स्त्री पुरुषों को यज्ञ में सम्मिलित होने का अधिकार है। ब्राह्मण व्यक्ति अपने कर्मों से बनता है, जन्म से नहीं होता।
मंत्र लेखन व नियमित अनुष्ठान करने को कहा। उनके स्वयं के चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरणों की समाप्ति का समय आ रहा था। गायत्री जयन्ती 1943 में उसकी औपचारिक पूर्णाहुति होनी थी। उस दिन तक उनने तपोभूमि पर मन्दिर के निर्माण तथा गायत्री माता की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा कर डालने का निश्चय कर लिया व इस पुनीत कार्य में सभी साधकों से सहयोग माँगा। उसके लिए नवम्बर माह 1949 के अंक में गायत्री तपोभूमि का संभावित रूप क्या होगा, इसका एक चित्र छापा व उसके नीचे एक पंक्ति दी, “देखें किन्हें पुण्य मिलता है इस पवित्र तीर्थ को बनाने का” आश्चर्य होता है यह देखकर कि तपोभूमि वैसी ही बनी जैसा कि इसका प्रारूप बनाया गया था।
मंत्र लेखन का अनुरोध भी। ऊपर वर्णित यज्ञ चैत्र माह 1953 (संवत् 2013) तक चलने थे। इनके समापन पर ही विशाल 108 महाकुण्डी यज्ञ व नरमेध यज्ञ का आयोजन किया गया। नरमेध प्रक्रिया देखने हजारों व्यक्ति आ जुटे। जिनने समाज के लिए कार्य करने का संकल्प लिया था उसके हाथ अलग-अलग रंग की रेशम की डोरियों से खंभों से बाँधे गये।